सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी: बिना उचित प्रक्रिया के हुई बुलडोजर कार्रवाई असंवैधानिक
प्रयागराज में हुई बुलडोजर कार्रवाई को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने यूपी सरकार को कड़ी फटकार लगाई है। शीर्ष अदालत ने इसे नागरिक अधिकारों का खुला उल्लंघन करार देते हुए कहा कि बिना उचित कानूनी प्रक्रिया अपनाए किसी का मकान गिराना संविधान के खिलाफ है। सुप्रीम कोर्ट ने प्रयागराज विकास प्राधिकरण को आदेश दिया कि पांचों पीड़ितों को छह हफ्तों के भीतर 10-10 लाख रुपये का मुआवजा दिया जाए।
बिना पर्याप्त नोटिस के गिराए गए मकान!
याचिकाकर्ताओं का आरोप है कि प्रशासन ने बिना पर्याप्त नोटिस दिए महज 24 घंटे के भीतर उनके मकानों को ध्वस्त कर दिया। उनके अनुसार, 1 मार्च 2021 को प्रशासन ने नोटिस जारी किया था, लेकिन उन्हें यह नोटिस 6 मार्च को मिला। अगले ही दिन यानी 7 मार्च को उनके मकानों पर बुलडोजर चला दिया गया। इस मामले में वकील जुल्फिकार हैदर, प्रोफेसर अली अहमद और अन्य पीड़ितों ने पहले इलाहाबाद हाईकोर्ट में अपील की थी, लेकिन हाईकोर्ट ने उनकी याचिका खारिज कर दी। इसके बाद वे सुप्रीम कोर्ट पहुंचे, जहां अदालत ने राज्य सरकार की कार्रवाई को अनुचित करार दिया।
‘राइट टू शेल्टर’ का उल्लंघन
सुनवाई के दौरान जस्टिस उज्जल भुइयां ने टिप्पणी की कि ‘राइट टू शेल्टर’ नाम की भी एक चीज होती है और सरकार को कानूनी प्रक्रिया का पालन करना चाहिए। उन्होंने यूपी के अंबेडकर नगर में 24 मार्च को हुई एक घटना का भी जिक्र किया, जहां अतिक्रमण विरोधी अभियान के दौरान झोपड़ियों पर बुलडोजर चला दिया गया। इस दौरान एक 8 साल की बच्ची अपनी किताबें लेकर भागती नजर आई थी। अदालत ने कहा कि ऐसी घटनाएं आम जनता के अधिकारों का हनन करती हैं और प्रशासन को मनमानी कार्रवाई से बचना चाहिए।
राज्य सरकार के तर्कों को सुप्रीम कोर्ट ने किया खारिज
राज्य सरकार की ओर से अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणी ने दलील दी कि सरकार ने उचित प्रक्रिया का पालन किया और नोटिस जारी करने के बाद ही कार्रवाई की गई। उन्होंने कहा कि बड़े पैमाने पर अवैध कब्जे हटाना आवश्यक था। लेकिन इस पर जस्टिस अभय एस. ओका ने सवाल उठाते हुए कहा कि अगर नोटिस दिया गया था, तो उसे उचित तरीके से क्यों नहीं दिया गया? उन्होंने कहा कि सिर्फ नोटिस चिपकाने से काम नहीं चलता, इसे कूरियर से भेजा जाना चाहिए था। बिना उचित सूचना के की गई यह कार्रवाई अन्यायपूर्ण और अमानवीय है।
गलतफहमी में गिरा दिए गए मकान
पीड़ितों के वकील अभिमन्यु भंडारी ने सुप्रीम कोर्ट में दलील दी कि प्रशासन ने उनके मुवक्किलों की संपत्तियों को गैंगस्टर अतीक अहमद की संपत्ति समझकर ध्वस्त कर दिया। उन्होंने कहा कि यह सरकार की एक बड़ी गलती थी और उसे इसे स्वीकार करना चाहिए। हालांकि, यूपी सरकार ने तर्क दिया कि सभी याचिकाकर्ताओं को पहले ही नोटिस दिया गया था और उचित समय दिया गया था।
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पहले की थी याचिका खारिज
इससे पहले इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सरकार के पक्ष को स्वीकार करते हुए याचिका खारिज कर दी थी। सरकार ने कहा था कि जिन मकानों को ध्वस्त किया गया, वे नजूल लैंड (सरकारी भूमि) पर बने थे और उनकी लीज 1996 में समाप्त हो गई थी। इस आधार पर सरकार ने इन्हें अवैध कब्जा मानते हुए बुलडोजर कार्रवाई की थी।
सुप्रीम कोर्ट का आदेश: छह हफ्तों में दें मुआवजा
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में प्रयागराज विकास प्राधिकरण को आदेश दिया कि वह पांचों पीड़ितों को छह हफ्तों के भीतर 10-10 लाख रुपये का मुआवजा दे। अदालत ने स्पष्ट किया कि इस तरह की मनमानी कार्रवाई को भविष्य में किसी भी कीमत पर बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। कोर्ट ने यह भी कहा कि ‘राइट टू शेल्टर’ के उल्लंघन की घटनाओं को रोका जाना चाहिए और प्रशासन को पहले उचित प्रक्रिया अपनानी चाहिए।
निष्कर्ष
सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले को एक महत्वपूर्ण मिसाल के रूप में देखा जा रहा है, जिससे यह स्पष्ट होता है कि राज्य सरकारें मनमाने तरीके से नागरिकों के मकानों को ध्वस्त नहीं कर सकतीं। अदालत ने प्रशासन को चेतावनी दी है कि भविष्य में बिना उचित कानूनी प्रक्रिया अपनाए ऐसी कोई भी कार्रवाई अस्वीकार्य होगी। इस फैसले से उन हजारों लोगों को राहत मिल सकती है, जो अतिक्रमण विरोधी अभियानों के दौरान बिना किसी सुनवाई के अपने घर गंवा चुके हैं।
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